Saturday, July 29, 2023

आचार्य महर्षि सुश्रुत : फादर ऑफ सर्जरी

 भारत के आचार्य महर्षि सुश्रुत को पूरी दुनिया फादर ऑफ सर्जरी यानी शल्य चिकित्सा का जनक मानती है।

सुश्रुत ने शल्यक्रिया के लगभग 101 यंत्रों का ज्ञान कराया है

शल्य चिकित्सा के पितामह और 'सुश्रुत संहिता' के प्रणेता आचार्य सुश्रुत का जन्म 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में काशी में हुआ था।

सुश्रुत ने 300 प्रकार की ऑपरेशन प्रक्रियाओं की खोज की। कॉस्मेटिक सर्जरी में विशेष निपुणता हासिल कर ली थी।

सुश्रुत संहिता अथर्ववेद का ही हिस्सा है. इसमें भारतीय चिकित्सा में सर्जरी की प्राचीन परंपरा का वर्णन मिलता है. साथ ही इसमें प्राचीन शल्य चिकित्सक सुश्रुत की शिक्षाओं और अभ्यास का भी विस्तृत विवरण है, जो आज भी महत्वपूर्ण व प्रासंगिक शल्य चिकित्सा ज्ञान है।




सुश्रुतसंहिता में मोतियाबिंद के ओपरेशन करने की विधि को विस्तार से बताया गया है। उन्हें शल्य क्रिया द्वारा प्रसव कराने का भी ज्ञान था। सुश्रुत को टूटी हुई हड्डियों का पता लगाने और उनको जोडऩे में विशेषज्ञता प्राप्त थी।


सुश्रुत ने शल्यक्रिया के लगभग 101 यंत्रों का ज्ञान कराया है। सुश्रुत भारत में ही नहीं, विदेशों में भी विख्यात हुए। चरक संहिता की भांति उनका ग्रंथ सुश्रुत संहिता अन्य देशों में प्रसिद्ध हुआ। सन् 800 ईं. में सुश्रुत संहिता का अनुवाद अरबी भाषा में 'किताबे सुश्रुत' नाम से किया गया।

अरब के प्रसिद्ध चिकित्सक टेजिस ने अपने ग्रंथों में सुश्रुत का उल्लेख करते हुए उन्हें शल्य-विज्ञान का आचार्य माना है। 9-10वीं शताब्दी के ईरान के महान चिकित्सक राजी ने सुश्रुत संहिता का कई बार वर्णन किया है और सुश्रुत को एक महान चिकित्सक माना है।


The whole world considers Acharya Maharishi Sushruta of India as the father of surgery.

 Sushruta has given knowledge of about 101 surgical instruments.

 Acharya Sushruta, father of surgery and founder of 'Sushruta Samhita', was born in Kashi in 6th century BC.

 Sushruta discovered 300 types of operation procedures. Had acquired special expertise in cosmetic surgery.

 Sushruta Samhita is a part of Atharvaveda only. It describes the ancient tradition of surgery in Indian medicine. It also contains a detailed description of the teachings and practice of the ancient surgeon Sushruta, which is still important and relevant surgical knowledge today.

 The method of cataract operation has been explained in detail in Sushruta Samhita. He also had the knowledge of giving birth through surgery. Sushruta had expertise in locating and joining broken bones.

 Sushruta has given knowledge of about 101 surgical instruments. Sushruta became famous not only in India but also abroad. Like Charaka Samhita, his book Sushruta Samhita became famous in other countries. Year 800 AD The Sushruta Samhita was translated into Arabic under the name 'Kitabe Sushruta'.

 The famous Arab physician Tejis, while mentioning Sushruta in his books, has considered him as the master of surgery. Raji, the great physician of 9-10th century Iran, has described the Sushruta Samhita several times and described Sushruta as a great physician.





Thursday, July 27, 2023

Amazing AI video on Nalanda University in Hindi & English

 Divine Chronicles ( Instagram) के सौजन्य से यह अद्भुत वीडियो मैं आप तक ला रहा हूं इसमें 1 मिनट और 32 सेकंड में नालंदा विश्वविद्यालय के इतिहास की कहानी कही गई है। यह अत्यंत मेहनत और क्रिएटिव वाला कार्य है और इसके लिए इसे बनाने वाले को सनातनियों का नमस्कार है। 


This is an amazing video created using artificial intelligence by divine chronicles on Instagram, which depicts the history of Nalanda University in just 1.34 minutes. This requires a lot of technological knowledge and smart work and deserves. Thanks from the Sanatan parivar. 

Paritosh Vyas 




Wednesday, July 26, 2023

The Monkey and the Wedge from the Panchatantra

 The Monkey and the Wedge

"One, who interferes in other's work, surely comes to grief".

"जो व्यक्ति दूसरों के कार्य में हस्तक्षेप करता है, उसे अवश्य ही दुःख मिलता है।"




There was once a merchant who employed many carpenters and masons to build a temple in his garden. Regularly, they would start work in the morning; and take a break for the mid-day meals, and return to resume work till evening.

One day, a group of monkey arrived at the site of the building and watched the workers leaving for their mid-day meals.

One of the carpenters was sawing a huge log of wood. Since, it was only half-done; he placed a wedge in between to prevent the log from closing up. He then went off along with the other workers for his meal.

When all the workers were gone, the monkeys came down from the trees and started jumping around. 

One monkey was interested in the wedge that was put between the logs. He sat down on the log and put himself in the middle of the half-split log. He then grabbed the wedge and started pulling on it. The wedge came out of nowhere. So, the half-split log closed in on the monkey, and the monkey got stuck in the gap. He was badly hurt, which was his fate. 

The monkey and the wedge story is good to tell your kids. 

Moral of the Story of the Monkey and the Wedge 

The moral of the story of the monkey and the wedge is that we shouldn't stick our noses into things we don't know about. Whoever does this will surely end up in trouble.


एक बार एक व्यापारी था जिसने अपने बगीचे में एक मंदिर बनाने के लिए कई बढ़ई और राजमिस्त्री को काम पर लगाया था। नियमित रूप से, वे सुबह काम शुरू करते थे; और मध्याह्न भोजन के लिए अवकाश के बाद शाम तक काम करते थे।

 एक दिन, बंदरों का एक समूह भवन स्थल पर पहुंचा और श्रमिकों को मध्याह्न भोजन के लिए जाते हुए देखा।

 एक बढ़ई लकड़ी के एक विशाल लट्ठे को काट रहा था। चूँकि, यह केवल आधा-अधूरा ही था; उसने लॉग को बंद होने से रोकने के लिए बीच में एक कील लगा दी। इसके बाद वह अन्य कार्यकर्ताओं के साथ भोजन के लिए चला गया।

 जब सभी मजदूर चले गए तो बंदर पेड़ों से उतर आए और इधर-उधर उछल-कूद करने लगे।

 एक बंदर को लट्ठों के बीच लगाई गई कील में दिलचस्पी थी। वह लट्ठे पर बैठ गया और खुद को आधे कटे लट्ठे के बीच में रख दिया। फिर उसने कील पकड़ ली और उसे खींचने लगा। कील कहीं से निकल आई। तो, आधा फटा हुआ लट्ठा बंदर के ऊपर बंद हो गया और बंदर खाली जगह में फंस गया। उसे बहुत चोट लगी, जो उसका भाग्य था।

 बंदर और कील की कहानी आपके बच्चों को सुनाने के लिए अच्छी है।

 बंदर और कील की कहानी का नैतिक

 कहानी का नैतिक यह है कि हमें उन चीजों में अपनी नाक नहीं घुसानी चाहिए जिनके बारे में हम नहीं जानते हैं। जो भी ऐसा करेगा वह निश्चित ही मुसीबत में फंस जाएगा।

Video of the Monkey and the Wedge

Tuesday, July 25, 2023

प्रजा के बप्पा, भीलों के रावल, खलीफा को हराने वाले कालभोज: अरबों को ईरान तक खदेड़ने वाले महाराव, जिनसे 500 सालों तक काँपते रहे इस्लामी शासक


हमारे इतिहासकारों की वजह से अधिकतर लोगों ने इस महान राष्ट्रपुत्र का नाम कि नहीं सुना है। 

इस्लामी आक्रमणकारियों को धूल चटा कर इन्होंने खदेड़ा। भारत की रक्षा की। कहते हैं हरित साधु नाम के एक ऋषि से उनकी मुलाकात हुई थी, जिन्होंने उन्हें ‘शैव तंत्र’ का शिक्षण दिया। इसके तहत उन्हें युद्धकला से लेकर जीवन के हर पहलू सिखाए गए। फिर उक्त साधु ने उन्हें इस्लामी आक्रांताओं से मेवाड़ को मुक्त करने को कहा। उन्हें स्वप्न में माँ भवानी ने चित्तौर के मोरी राजवंश की मदद करने का आदेश दिया। बप्पा रावल ने इस्लामी फ़ौज को ऐसा खदेड़ा था कि अगले 200 वर्षों तक उनकी भारत पर बड़े आक्रमण की हिम्मत नहीं हुई।

बप्पा रावल का बचपन संघर्षों में गुजरा। उनकी माँ ने भीण्डर के जंगलों में भाग कर बेटे की जान बचाई, जहाँ यदु वंश के भील राजा मांडलिक ने उनकी रक्षा की। 


‘शैव तंत्र’ का ही प्रभाव था कि बप्पा रावल ने भगवान एकलिंग को अपना इष्ट बनाया और तब से मेवाड़ की सेना ‘जय एकलिंग’ के उद्घोष के साथ ही युद्ध में उतरती रही।

जब इधर राजा मान मोरी वीर बप्पा रावल को ‘सामंत’ की उपाधि से नवाज कर उनके हिस्से की जागीर उन्हें दे रहे थे, उसी दौर में एक तरफ सिंध में मुहम्मद कासिम के रूप में पहली बार इस्लामी आक्रांता भारतवर्ष में घुसे।

राजा दाहिर की हार और हत्या के साथ भारत ने पहली बार युद्ध के बाद बलात्कार और सिर कलम करने जैसी घटनाओं को देखा, वो भी थोक में। भारतीय राजा हार-जीत के बाद भी एक-दूसरे की प्रजा और परिवार का सम्मान करते थे, लेकिन अरब के इस्लामी आक्रांताओं के साथ ऐसा नहीं था। ब्राह्मण राजा दाहिर और उनके बहादुर भाई ने कई बार मुहम्मद बिन कासिम को पीछे धकेला। लेकिन, सन् 712 में सब कुछ बदल गया।

राजा दाहिर और उनके भाई का सिर कलम कर दिया गया, उनकी बेटियों को खलीफा हज्जाज बिन युसूफ को भेंट के रूप में भेजा गया, कई महिलाओं को सेक्स स्लेव बना लिया गया और सिंध के अमीरों को लूट कर मुहम्मद बिन कासिम मेवाड़ की तरफ बढ़ा।

राजा दाहिर के बेटे ने भाग कर मेवाड़ में शरण ली और बप्पा रावल को पूरी स्थिति के बारे में बताया। महिलाओं के साथ इस अत्याचार ने बप्पा रावल को क्रोधित कर दिया, लेकिन वो एक लंबे युद्ध के लिए गठबंधन तैयार करने में लग गए। उनका मानना था कि ये ‘म्लेच्छ’ आसानी से नहीं मानेंगे और बार-बार भारत पर आक्रमण करेंगे। बप्पा रावल ने मालवा (मध्य प्रदेश) के शासक गुर्जर-प्रतिहार राजवंश के नागभट्ट I के साथ गठबंधन किया।

इसके बाद उन्होंने गुजरात के पुलकेशीराजा और जयभट्ट को भी अपने साथ लिया। नागभट्ट के आग्रह पर चालुक्य राजा जय सिम्हा वर्मन ने अपने पुत्र पुलकेशीराजा को इस्लामी फ़ौज के खिलाफ इस युद्ध में भेजा। तब तक अरब सेना का नेतृत्व कर रहे जुनैद अल मर्री ने दक्षिणी गुजरात, मालवा और दक्षिणी राजस्थान के कुछ इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया था। सन् 738 में हिन्दुओं की 6000 की सेना ने 60,000 की अरब फ़ौज के साथ जोधपुर के नजदीक युद्ध किया।

जुनैद का इस युद्ध में वध कर दिया गया और इस्लामी फ़ौज को खदेड़ कर अरब की उम्मैयद वंश को कड़ा सन्देश भी दे दिया गया। मध्य पूर्व, पर्शिया, मेसोपोटामिया, सीरिया और उत्तरी अफ्रीका में उन्होंने जो सफलता पाई थी, उसे वो भारत में नहीं दोहरा पाए। बप्पा रावल की रणनीति ने पश्चिमी भारत का गणित ऐसा बदला कि इसकी चर्चा दुनिया भर में होने लगी। सोचिए, भारत पर खलीफा का राज हो जाता तो यहाँ के हिन्दुओं, खासकर महिलाओं की क्या स्थिति होती।

जेम्स टॉड ने लिखा है कि हिन्दू सेना ने ईरान तक अरबों को खदेड़ा और उन्हें कहीं शरण नहीं मिल रही थी। बप्पा रावल मानवीय मस्तिष्क को समझने वाले व्यक्ति थे। बप्पा रावल जब अफगानिस्तान पहुँचे तो गजनी नामक शहर पर उन्होंने किसी सलीम को शासन करते हुए पाया। बप्पा रावल ने सलीम को हरा कर अपने भतीजे को वहाँ बिठाया, जिससे अगले कई शताब्दियों तक वहाँ हिन्दुओं का शासन रहा।

राजा दाहिर की बेटियों ने लिया बदला, चित्तौड़ की कमान बप्पा रावल के हाथों में : 

अरब से लौटते समय दूरदर्शी बप्पा रावल ने कई चेक पोस्ट्स स्थापित किए। राजा दाहिर सेन की बेटियों प्रेमला और सूर्या ने खलीफा से झूठ बोला कि मुहम्मद बिन कासिम ने खलीफा के पास भेजने से पहले उन दोनों को ‘अपवित्र’ कर दिया है। इसे सुनते क्रोशित खलीफा ने कासिम को तलब किया। उसे बाँध कर बंद कर के लाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही वो कुत्ते की मौत मर गया। बाद में राजा दाहिर की बहादुर बेटियों ने खलीफा को बता दिया कि उन्होंने झूठ बोला था, जिसके बाद क्रूर इस्लामी शासक ने दोनों को दीवार में ज़िंदा दफनाने का हुक्म जारी कर दिया।

उन्हें ‘महाराव’ की उपाधि मिली। उन्हें ‘हिन्द सूरज’ भी कहा गया। उन्हें ‘राजगुरु’ की उपाधि भी मिली। बप्पा को भील समाज ने ‘रावल (रा – राज्य, व – वर्वत/आशीर्वाद, ल – लक्ष्मी/धन)’। पाकिस्तान का ‘रावलपिंडी’ कभी बप्पा रावल का एक बड़ा चेकपोस्ट हुआ करता था, जिस पर उस जगह का ये नाम पड़ा।

8वीं शताब्दी के इस महायोद्धा का नाम शायद ही हमारे पाठ्य पुस्तकों में मिलता हो, जबकि अरबी आक्रांताओं के नाम सभी को बताए जाते हैं। एक गौपालक परिवार से मेवाड़ पर देश हजार वर्ष शासन करने वाले परिवार की स्थापना तक, बप्पा रावल ने हिंदुत्व के लिए बड़ा योगदान दिया।


कंटेंट के लिए op India ko धन्यवाद 




Monday, March 9, 2015

राष्ट्रीय स्वाभिमान - विचार , लक्ष्य व नारा





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Saturday, March 7, 2015