Monday, October 16, 2023

Day 2 of Navratri. Devi Brahmacharini

 Read the English story below the Hindi version 

देवी ब्रह्मचारिणी की कहानी

पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। 

 

कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया। 


कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा- हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं।

 

इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है।


Story of Goddess Brahmacharini


 In her previous birth, this goddess was born in the form of a daughter in the house of Himalaya and with the advice of Naradji, she performed severe penance to get Lord Shankar as her husband. Due to this difficult penance, she was named Tapashcharini i.e. Brahmacharini. She spent a thousand years eating only fruits and flowers and for a hundred years she survived on vegetables.

 

 She Observed a strict fast and endured severe hardships under the open sky in the form of rain and sun. For three thousand years she ate broken Bilva leaves and continued worshiping Lord Shankar. After this he even stopped eating dried Bilva leaves. She continued to do penance by remaining waterless and fasting for several thousand years. Because she stopped eating leaves, she was named Aparna.


Due to severe penance the goddess's body became completely emaciated. Gods, sages, Siddhagans and sages all praised Brahmacharini's penance as an unprecedented virtuous act and said - O Goddess, till date no one has performed such harsh penance. This was possible only with you. Your wishes will be fulfilled and you will get Lord Chandramauli Shivji as your husband. Now leave penance and return home. Your father is coming to call you soon.

The essence of the story of this goddess is that the mind should not be distracted even in the difficult struggles of life. All accomplishments are achieved by the grace of Mother Brahmacharini Devi. This form of the goddess is worshiped on the second day of Durga Puja.

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